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डॉ. बालशौरि रेड्डी और हिन्दी प्रण

May 23, 2020

डॉ. बालशौरि रेड्डी और हिन्दी प्रण  


बात उस समय की है जब 'हिन्दी प्रचार सभा' के रजत जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी 1946 में मद्रास आए थे| इसी सभा में आंध्र प्रदेश के एक गाँव से एक 18 वर्षीय युवक भी शामिल हुआ था| उस युवक की रुचि संभवत: सभा में कम और गांधीजी में ज्यादा थी| हाँ, वह युवक भी अन्य लोगों की तरह गांधीजी का ऑटोग्राफ भी लेना चाहता था| युवक ने गांधीजी का ऑटोग्राफ तो लिया, मगर खुशी के स्थान पर उसके चेहरे पर निराशा की लकीरों को पढ़ा जा सकता था| गांधीजी ने अपने ऑटोग्राफ में लिखा थाµ'मो क  गांधी'

इस ऑटोग्राफ को पाने के लिए युवक को पाँच रुपए खर्च करने पड़े थे| युवक को पाँच रुपए ख़र्च करने का मलाल नहीं था| लेकिन निराशा की बात यह थी कि वह इस ऑटोग्राफ को यदि अपने गाँववासियों को दिखाएगा, तो कोई भी उसे पढ़ नहीं सकता था| क्योंकि उसके गाँव में किसी को भी हिन्दी नहीं आती थी| साथ ही ऑटोग्राफ के अक्षर इतने गंदे थे कि युवक को लगा कि कोई विश्वास ही नहीं करेगा कि ये अक्षर गांधीजी के हैं| पैसे भी लगे, काम भी नहीं हुआ| 

सभा का उद्घाटन हुआ| गांधीजी अपना भाषण देने के लिए आगे आए| उन्होंने कहा, 'बहुत जल्द हिन्दुस्तान आजाद होने जा रहा है| हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हिन्दी होगी| मैं युवा पीढ़ी से अपील करता हूँ कि वे अभी से हिन्दी सीखें ताकि हिन्दुस्तान के आजाद होते ही सारा राजकाज हिन्दी में कर सकें| अगे्रजी विलायत की भाषा है| वह कदापि हमारी राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती|' गांधीजी के ये शब्द युवक  के कानों में गूँजने लगे| युवक को गांधीजी का यह संदेश मंत्र जैसा प्रतीत हुआ| इस संदेश को सुनने के पश्चात्र अनायास युवक का विषाद हर्ष में बदल गया| उसी क्षण तेलुगुभाषी युवक ने 'हिन्दी' सीखने का प्रण लिया और विशारद, साहित्यरत्न और साहित्यालंकार की परीक्षाएं उत्तीर्ण की. हिंदी सीखने के लिए काशी और प्रयाग गए जहां उनका परिचय बड़े साहित्यकारों से हुआ। कल के तेलुगुभाषी युवक आज के हिन्दी और तेलुगु के यशस्वी साहित्यकार डॉ॰ बालशौरि रेड्डी जी  है. उनका सम्पूर्ण  जीवन हिंदी लेखन के प्रति समर्पित रहा... 


 साभार 
डॉ  गिरिराजशरण अग्रवाल



डॉ. कुमार विश्वास और चरित्रवान- चरित्रहीन चाय प्रसंग।

May 22, 2020
अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस पर


 डॉ. कुमार विश्वास एम०ए० कर रहे थें तो एक बार हिंदी के एक महान आलोचक-निबंधकार व बड़े आचार्य से मिलने गये  थे ! उन्होंने नाम बताना जरूरी नहीं समझा इसलिए उजागर नहीं किया ख़ैर वो आगे बताते हैं कि  भेंट से पहले उन्होंने उन्हें अनेक पत्र लिखे थे , और अपनी कविताएँ व लेख भेजे थे ,तब जाकर आचार्य जी ने मिलने का थोड़ा समय दिया था ! 

आचार्य जी मिले और थोड़ी ही देर में डॉ. कुमार विश्वास कि मासूम अल्पज्ञ-चपलता पर मोहित हो गए ! रीझकर बोले “बालक ! चाय पियोगे ?”उन्होंने  कहा “आचार्य यह तो प्रसाद होगा, आपके हाथ का तो विष भी अमृत है “ आचार्य जी हंसकर बोले “चरित्रवान चाय पियोगे या चरित्रहीन ?” डॉ. कुमार विश्वास  चारों खाने चित! 

डॉ. कुमार विश्वास ने कहा “आचार्य मुझ मूरख को इतना ज्ञान कहाँ ? आप ही चाय की इन दोनों कोटियों से परिचय कराइए ?” आचार्य जी बोले “बेटा ! जो चाय चीनी-मिट्टी के कप में आती है वो चरित्रहीन है, हर बार धुल-पूछ कर नए रूप में, नए साज-सिंगार में आकर नए प्रेमी के अधर-पल्लव को चूमती है ! पर जो चाय कुल्हड़ में पी जाती है वह तो पंचतत्वों से एक बार स्वयं को तपाकर तैयार करती है और किसी अधर से एक बार जब छू जाए तो उसके बाद अपना नश्वर शरीर त्याग देती है और पुनः अग्नि में तपकर नया जन्म लेती है नए प्रेमी के अधर छूने के लिए “
डॉ. कुमार विश्वास कहते  है कि पता नहीं उनकी इस व्याख्या का निहितार्थ क्या था पर हाँ उस दिन से कुल्हड़ की चाय से इश्क़ हो गया.!



साभार 
डॉ. कुमार विश्वास


मुंशी प्रेमचंद और फिल्म "मिल मज़दूर"

May 18, 2020


मुंशी प्रेमचंद को एक फिल्म लिखने का ऑफर मिला।

फिल्म का नाम था "मिल मज़दूर"


ये प्रेमचंद की लिखी एक मात्र फिल्म है  इतिहास की,
प्रेमचंद को इस फिल्म के लिए उस समय 8000 रुपये मिले थे जो बहुत बड़ी रकम थी तब के हिसाब से 1934  में।
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प्रेमचंद ने ना केवल फिल्म लिखी थी बल्कि इसमें मजदूरों के नेता का एक छोटा सा रोल भी किया था।

फिल्म बना रहा था अजंता प्रोडक्शन नाम का स्टूडियो।
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फिल्म 1934 में बनकर तैयार हो गयी,
प्रेमचंद इस दौर में मुंबई में ही रहे।
1934 से 1935 तक।

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फिल्म की कहानी ये थी के एक टेक्सटाइल मिल का मालिक मर जाता  है, और उसके बेटे को मिल चलाने के लिए मिल जाती है,
अब वो नए विचारों का लड़का होता है, और बिज़नेस की बढ़ोत्तरी के लिए इंसान को इंसान नहीं समझता होता है।
लोगों को निकालना उन्हें प्रताड़ित करना ये सब मिल में होने लग जाता है।
फिल्म की हीरो उसकी बहन है, जो पिता को मिल चलाते देख रही थी मरने से पहले,
वो मजदूरों के हकों के लिए खड़ी हो जाती है, उनसे हड़तालें करवाती है।
एन्ड में भाई जेल जाता है, और लड़की मिल को  वापस शुरू करती है।
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अब फिल्म में लड़की का डायलाग बताते हैं की इतना असरदार  था की उस से मुंबई जो उस समय टेक्सटाइल का हब माना जाता था वहां मजदूरों की क्रांति होने लग गयी।

उस समय जिसने फिल्म देखि थी उसका कहना था की प्रेमचंद ने बेहतरीन फिल्म लिखी है।
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1935 में फिल्म को रिलीज़ करने की मेहनत शुरू हुई,
बोर्ड ने इसे बैन कर दिया,
फिल्म को दुबारा नए  नाम "सेठ की लड़की" से रिलीज़ करने की कोशिश की,
लेकिन बिज़नेस लॉबी ने इसे फिर बैन करवा दिया।

मिल मालिकों ने फिल्म सिनेमा हाल से हटवा दी। कई जगह जोर जबरदस्ती से।

प्रेमचंद फिर मुंबई छोड़कर चले गए, उन्हें लगा की अब कोई  फायदा नहीं है यहां रहने का।
उन्होंने जाते हुए बयान दिया था की "शराब के धंधे की तरह ही फिल्म का धंधा भी बिज़नेस माफिया चलाता है, क्या दिखाना है क्या नहीं दिखाना सब वही तय करते हैं। "
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और प्रेमचंद की बात सही भी थी।
इंडस्ट्री उस समय बदहाली से गुजर रही थी,
मजदूरों के हकों का कोई ख्याल नहीं रखा  जा रहा था,
1929 के ग्रेट डिप्रेशन ने पूरी दुनिया के बिज़नेस को डब्बा कर रखा था।
मजदूरों को तनख्वां नहीं मिल रही थी, भूखे मर रहे थे मजदूर, घर जाएँ कैसे उसके भी पैसे नहीं थे उनके पास!
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1936 में फिल्म को कांट छांट के रिलीज़ किया गया "दया की देवी" नाम से।
फिल्म इक्का दुक्का किसी ने देखि होगी।
फिल्म लाहौर, दिल्ली, और लखनऊ में रिलीज़ हुई थी, लेकिन वहाँ से भी वो फिर हटवा दी गयी।
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फिल्म को बार बार बैन करवाने में बिज़नेस लॉबी का हाथ था,
और उस लॉबी का उस समय लीडर था भयरामजी जीजाभाई, जो उस समय ना केवल सेंसर बोर्ड के मेंबर थे, बल्कि टेक्सटाइल मिल एसोसिएशन के प्रेजिडेंट भी थे !
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इस से केवल प्रेमचंद ही मुंबई से वापस नहीं गए, फिल्म को बनाने वाला अजंता प्रोडक्शन भी दिवालिया हो गया।
फिल्म की अब कोई कॉपी नहीं है दुनिया में।  सब लॉस्ट हो चुकी हैं, अब इसके बारे में केवल उस समय की ख़बरों में पढ़ा जा सकता है।
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इस समय ये शेयर करने का मकसद ये है के इस से आपको बिज़नेस लॉबी की मीडिया पर पकड़ का अंदाजा हो जाएगा की ये film/news मीडिया अभी नहीं बिका है, हमेशा से बिका रहा है।
बिज़नेस लॉबी इसे शुरू से ड्राइव कर रही है, खबरें फिल्में आप तक फ़िल्टर होकर ही पहुँचती है, उनमे से आपको कम बुरा और ज्यादा बुरा में से कुछ चूज़ करना होता हो।

आज जिस तरह से मज़दूरों की सडकों पर मौत  हो रही है और उन्हें घर नहीं जाने दे रही सरकार, ऐसे समय में परदे के पीछे के विलन पहचानना जरूरी हो जाता है, की क्यों नहीं बस और ट्रैन में भेजे गए मजदूर जबकि देश में बस और ट्रैन दोनों इस समय खाली खड़ी हैं।
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#Bonus :- फिल्म से जुडी एक इंटरेस्टिंग बात ये और है की प्रेमचंद की फिल्म से ना केवल मुंबई की मिलों में हड़ताल हुई, बल्कि बनारस में खुद प्रेमचंद की प्रेस में हड़ताल हो गयी थी।

साभार
-Krishan Rumi
जितेन्द्र विसारिया